जस्टिस अर्जन कुमार सिकरी, जो सिंगापुर इंटरनेशनल कमर्शियल कोर्ट के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के पूर्व न्यायाधीश हैं, ने इस अवसर पर कहा कि भारत को तेजी से बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक माहौल में अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान के लिए एक विश्वसनीय वैश्विक “सुरक्षित बंदरगाह” के रूप में स्थापित करना चाहिए।
खबर खास, चंडीगढ़ :
चंडीगढ़ में आयोजित इंडिया इंटरनेशनल डिस्प्यूटस वीक के चौथे दिन अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, सीमा-पार व्यापारिक विवादों, अवसंरचना से जुड़े मध्यस्थता मामलों तथा कॉरपोरेट गवर्नेंस में पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक (ई एस जी ) ढांचे की बढ़ती भूमिका पर व्यापक चर्चा की गई।
जस्टिस अर्जन कुमार सिकरी, जो सिंगापुर इंटरनेशनल कमर्शियल कोर्ट के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के पूर्व न्यायाधीश हैं, ने इस अवसर पर कहा कि भारत को तेजी से बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक माहौल में अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान के लिए एक विश्वसनीय वैश्विक “सुरक्षित बंदरगाह” के रूप में स्थापित करना चाहिए। उन्होंने कानूनी पेशेवरों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि जैसे-जैसे पूंजी, तकनीक और व्यापार सीमाओं के पार विस्तार कर रहे हैं, वैसे-वैसे विवाद भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में निवेशकों के विश्वास और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए विश्वसनीय, निष्पक्ष और प्रभावी विवाद समाधान तंत्र अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि परंपरागत रूप से मध्यस्थता और सुलह-समाधान अपनी लचीलापन, गोपनीयता और पक्षकारों की स्वायत्तता के कारण सीमा-पार व्यापारिक विवादों के समाधान के पसंदीदा साधन रहे हैं। हालांकि आधुनिक मध्यस्थता को बढ़ती लागत, देरी और निष्पक्षता से जुड़ी चिंताओं के कारण वैश्विक स्तर पर आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ रहा है। अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक अदालतों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि वे मध्यस्थता की लचीलापन को न्यायिक प्रणाली की सुरक्षा और अधिकार के साथ जोड़ती हैं।
उन्होंने बताया कि ऐसे मंच अक्सर अंतरराष्ट्रीय पीठों की अनुमति देते हैं, विदेशी वकीलों को पेश होने की अनुमति देते हैं और पक्षकारों द्वारा चुने गए कानूनों को लागू करते हैं। साथ ही ये संरचित केस प्रबंधन प्रणालियों के माध्यम से वाणिज्यिक न्यायशास्त्र के विकास में भी योगदान देते हैं।
कार्यक्रम के दौरान कई पैनल चर्चाएं भी आयोजित की गईं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान और वैश्विक व्यापार शासन में उभरती प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया गया। सीमा-पार व्यापार और निवेश विवादों पर केंद्रित एक पैनल ने विकसित हो रही वैश्विक व्यापार व्यवस्था तथा निवेशक-राज्य मध्यस्थता से उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा की।
जेम्स नेडअंपारा , जो सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ के प्रमुख हैं, ने बहुपक्षीय व्यापार ढांचे से द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों की ओर बढ़ते बदलाव को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे समझौते देशों को स्थिरता, श्रम मानकों और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं जैसे व्यापक मुद्दों को शामिल करते हुए अधिक प्रभावी ढंग से परिणाम प्राप्त करने में मदद करते हैं।
प्रणव नारंग ने व्यापार समझौतों के तहत पेशेवर सेवाओं के उदारीकरण से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि कानूनी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नियामकीय बाधाएं अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। इसी दौरान जोशुआ फाँग ने द्विपक्षीय निवेश संधियों के तहत वाणिज्यिक मध्यस्थता और निवेशक-राज्य मध्यस्थता के बीच अंतर स्पष्ट किया।
पैनल चर्चा के दौरान कराती सिंह ने बताया कि सरकारें विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र, प्रतिरोधी उपायों और व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात बाजारों के विविधीकरण द्वारा शुल्क और व्यापार बाधाओं का सामना कैसे करती हैं। हरी वेलुरी ने कहा कि द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार समझौते तेजी से वैश्विक व्यापार ढांचे को आकार दे रहे हैं, जबकि आपूर्ति श्रृंखला, स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे आधुनिक व्यापार नीति के केंद्र में आ गए हैं।
एक अन्य पैनल में अवसंरचना, निर्माण और ऊर्जा परियोजनाओं से संबंधित विवादों पर भी चर्चा की गई। इस सत्र का संचालन वी . आर . नीलाकांतान ने किया। इस दौरान गगन आनंद ने कहा कि हालांकि मध्यस्थता का उद्देश्य अदालतों पर बोझ कम करना था, लेकिन अवसंरचना परियोजनाओं से जुड़े विवादों में अक्सर विभिन्न चरणों पर न्यायिक हस्तक्षेप देखने को मिलता है।
सार्थक गुप्ता ने मध्यस्थों की जवाबदेही और मध्यस्थता कार्यवाहियों की बढ़ती लागत को लेकर चिंताएं व्यक्त कीं। इसके जवाब में गगन आनंद ने कहा कि तकनीकी साक्ष्य और विशेष विशेषज्ञता से जुड़े जटिल अवसंरचना विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता अत्यंत आवश्यक है।
अमित बंसल ने संस्थागत मध्यस्थता और पूर्वानुमेय प्रवर्तन तंत्र की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इससे निवेशकों का विश्वास मजबूत होता है। इसी प्रकार जनामाली माणिकला ने बिजली क्षेत्र में विवाद समाधान के संदर्भ में नियामक आयोगों और मध्यस्थता दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
सम्मेलन के दौरान कॉरपोरेट गवर्नेंस और व्यावसायिक नियमन में ई एस जी मानकों की बढ़ती भूमिका पर भी विशेष चर्चा की गई। कोमल कारनिक द्वारा संचालित एक पैनल में तारिणी मेहता ने कहा कि ई एस जी को केवल अनुपालन की आवश्यकता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान जैसे वैश्विक पर्यावरणीय संकटों के संदर्भ में इसे एक महत्वपूर्ण जोखिम-प्रबंधन ढांचे के रूप में समझा जाना चाहिए।
ज्ञानेंद्र नीरज , जो सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया से जुड़े हैं, ने सूचीबद्ध कंपनियों में ई एस जी मानकों को मजबूत करने के लिए बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (बी आर एस आर ) जैसी नियामकीय पहलों का उल्लेख किया।
मनुज भारद्वाज ने कहा कि ई एस जी अब निवेशकों की अपेक्षाओं, उपभोक्ता जागरूकता और विकसित हो रहे वैश्विक स्थिरता मानकों के कारण एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक सक्षम कारक बनता जा रहा है। वहीं माहिर सूद ने कहा कि ई एस जी विचार कॉरपोरेट गवर्नेंस ढांचे, पर्यावरणीय विनियमों और व्यावसायिक विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
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