भारतीय रुपया लगातार नौवें कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज करता रहा और 2026 में एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है। इसका कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की निकासी और मध्य पूर्व संकट को लेकर बढ़ती चिंताएँ बताई जा रही हैं।
खबर खास | नई दिल्ली
भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले फिर से तेज गिरावट के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में रुपया लगभग 0.3 प्रतिशत गिर गया। यह 96.86 प्रति डॉलर पर खुला और आगे बढ़ते हुए 41 पैसे की गिरावट के साथ 96.96 तक पहुँच गया, जिससे यह मनोवैज्ञानिक 97 के स्तर के बेहद करीब आ गया।
इस लगातार गिरावट ने निवेशकों, आयातकों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि रुपया इस साल एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है।
एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा 2026 में
रिपोर्ट्स के अनुसार, रुपया इस महीने अब तक लगभग 1.5 प्रतिशत और 2026 में अब तक 7 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है, जिससे यह इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है, क्योंकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के आयात बिल को और बढ़ा सकती हैं और चालू खाते के घाटे को भी बढ़ा सकती हैं।
अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव ने वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों को ऊँचा बनाए रखा है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की बढ़ी कीमतें देश के आयात खर्च को सीधे बढ़ा देती हैं।
अर्थशास्त्रियों को आशंका है कि इससे चालू वित्त वर्ष में भारत का चालू खाता घाटा काफी बढ़ सकता है। इसके अलावा विदेशी निवेश में कमजोरी और मध्य पूर्व से आने वाले रेमिटेंस पर भी असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है।
रुपया क्यों गिर रहा है?
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली रुपये की कमजोरी का एक बड़ा कारण है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है।
इसके अलावा भारत की कच्चे तेल पर भारी निर्भरता भी एक बड़ा कारण है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की बढ़ती कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों के चलते भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे रुपया और कमजोर हो रहा है।
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