शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड फूड को लेकर बढ़ी चिंता, सुप्रीम कोर्ट ने भी फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग में देरी पर केंद्र और FSSAI से मांगा जवाब
शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड फूड को लेकर बढ़ी चिंता, सुप्रीम कोर्ट ने भी फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग में देरी पर केंद्र और FSSAI से मांगा जवाब
पैकेज्ड फूड की लेबलिंग और उपभोक्ताओं की सेहत को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने सख्ती बढ़ा दी है। FSSAI ने फूड बिजनेस ऑपरेटर्स (FBOs) के लिए फूड लेबलिंग, डिस्प्ले, विज्ञापन और उत्पादों से जुड़े दावों के नियमों को लेकर विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया। इसका उद्देश्य कंपनियों को मौजूदा नियमों की जानकारी देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को सही और स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना है।
FSSAI ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि ‘लेबलिंग और डिस्प्ले तथा विज्ञापन और दावों के नियमों को समझना’ विषय पर आयोजित प्रशिक्षण सत्र में बड़ी संख्या में फूड बिजनेस से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। प्राधिकरण के मुताबिक, इसमें कंपनियों को लेबलिंग और विज्ञापन से संबंधित आवश्यकताओं को सही तरीके से पूरा करने पर जानकारी दी गई।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब ज्यादा शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड फूड उत्पादों पर स्पष्ट पोषण संबंधी जानकारी और फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल की मांग को लेकर चर्चा तेज है। खास तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को देखते हुए पैकेज्ड फूड की लेबलिंग को लेकर चिंता बढ़ रही है।
इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार और FSSAI से फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल लागू करने में हो रही देरी को लेकर सवाल किए हैं। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकार से यह बताने को कहा है कि बेहतर पोषण संबंधी चेतावनी व्यवस्था लागू करने की दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या उपभोक्ताओं, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी होने से उपभोक्ताओं को किसी उत्पाद को खरीदने से पहले उसके पोषण संबंधी प्रभावों को समझकर फैसला लेने में मदद मिल सकती है। कोर्ट ने उन दलीलों पर भी सवाल उठाया जिनमें कहा गया था कि सख्त चेतावनी लेबल से खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के कारोबार पर असर पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि किसी उत्पाद को खरीदने या न खरीदने का अंतिम फैसला उपभोक्ता का है और व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित फूड लेबलिंग फ्रेमवर्क की जानकारी भी मांगी थी और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया था। साथ ही संकेत दिया कि यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वह इस मामले में आगे आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
इससे पहले सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि पैकेजिंग और पोषण संबंधी चेतावनियों के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने में व्यावहारिक चुनौतियां हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा के उपायों में देरी के लिए भारत विदेशी मानकों का इंतजार नहीं कर सकता। ऐसे में आने वाले समय में पैकेज्ड फूड की लेबलिंग और उपभोक्ताओं को दी जाने वाली पोषण संबंधी जानकारी को लेकर नियम और सख्त होने की संभावना है।
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