4 सितंबर को मनाई जाएगी जन्माष्टमी, मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के साथ हर्षण और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग; बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग व्रत में रखें विशेष सावधानी
4 सितंबर को मनाई जाएगी जन्माष्टमी, मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के साथ हर्षण और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग; बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग व्रत में रखें विशेष सावधानी
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व जन्माष्टमी इस बार 4 सितंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक आस्था के साथ ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस वर्ष की जन्माष्टमी को विशेष माना जा रहा है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के साथ शुभ योगों का संयोग बन रहा है, जिसे पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद शुभ माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था। उस समय रोहिणी नक्षत्र था और चंद्रमा वृषभ राशि में स्थित थे। इसी कारण जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।
जीरकपुर के वीआईपी रोड स्थित निर्मल छाया के शिव दुर्गा मंदिर के आचार्य एवं ज्योतिर्विद सुनील किमोठी के अनुसार इस बार जन्माष्टमी की रात रोहिणी नक्षत्र के साथ हर्षण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का प्रभाव भी रहेगा। ज्योतिषीय मान्यता में इन योगों को शुभ माना जाता है। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने, दान-पुण्य करने और शुभ संकल्प लेने से सकारात्मक फल मिलने की मान्यता है।
हर किसी के लिए निर्जला व्रत जरूरी नहीं
आचार्य सुनील किमोठी के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत श्रद्धा और आस्था से किया जाता है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए उपवास करना उचित नहीं होता। बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर ही व्रत रखना चाहिए। किसी भी तरह की स्वास्थ्य समस्या होने पर धार्मिक नियमों से पहले चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देना बेहतर है।
लंबे समय तक भोजन और पानी से दूर रहने पर बुजुर्गों को कमजोरी, लो ब्लड शुगर और डिहाइड्रेशन जैसी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसे में वे अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। यदि तबीयत ठीक न हो तो व्रत रखने से बचना ही बेहतर है।
गर्भवती महिलाओं के लिए भी पर्याप्त पोषण और पानी बेहद जरूरी होता है। इसलिए उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के निर्जला या लंबे समय तक उपवास नहीं रखना चाहिए। वे चाहें तो व्रत के बजाय भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना और भक्ति कर सकती हैं। वहीं डायबिटीज, हृदय रोग, किडनी की बीमारी या अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित लोगों को उपवास रखने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। नियमित रूप से दवाइयां लेने वाले लोगों के लिए भी लंबे समय तक भोजन न करना परेशानी का कारण बन सकता है।
जन्माष्टमी व्रत में क्या करें?
जन्माष्टमी के व्रत से जुड़े नियम अलग-अलग परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार हो सकते हैं। आम तौर पर श्रद्धालु इस दिन अनाज का सेवन नहीं करते और फलाहार करते हैं। व्रत रखने वाले लोग अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजा और उपवास के नियमों का पालन करते हैं।
जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के दौरान उनका अभिषेक किया जाता है। इसके बाद देसी घी का दीपक जलाकर आरती की जाती है। भगवान को माखन-मिश्री, धनिए की पंजीरी और अन्य प्रसाद का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले भोग में तुलसी दल शामिल करना शुभ माना जाता है।
इस जन्माष्टमी पर शुभ योगों के बीच भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के साथ श्रद्धालुओं को अपनी सेहत का भी ध्यान रखना चाहिए। आस्था के साथ स्वास्थ्य का संतुलन बनाए रखते हुए पर्व मनाना ही सबसे बेहतर रहेगा।
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