नियमित छुट्टी के बावजूद 8 नवंबर को एक घंटे के लिए खुलेंगे BSE और NSE; जानिए 1957 से चली आ रही इस शुभ परंपरा के पीछे की कहानी
नियमित छुट्टी के बावजूद 8 नवंबर को एक घंटे के लिए खुलेंगे BSE और NSE; जानिए 1957 से चली आ रही इस शुभ परंपरा के पीछे की कहानी
खबर खास | चंडीगढ़
दिवाली के अवसर पर आमतौर पर भारत के शेयर बाजार नियमित कारोबार के लिए बंद रहते हैं। हालांकि, रोशनी का यह त्योहार बाजार की सामान्य छुट्टियों से अलग है, क्योंकि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) 'मुहूर्त ट्रेडिंग' नाम से एक विशेष एक घंटे के सत्र का आयोजन करते हैं। यह परंपरा निवेशकों को एक शुभ समय में शेयर खरीदने और बेचने की अनुमति देती है और नए हिंदू वित्तीय वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।
इस साल मुहूर्त ट्रेडिंग का विशेष सत्र 8 नवंबर को आयोजित किया जाएगा। मुख्य ट्रेडिंग सत्र दोपहर 2:20 बजे से 3:30 बजे तक चलेगा, जबकि प्री-ओपन सत्र दोपहर 2:05 बजे शुरू होगा।
प्री-ओपन सत्र के दौरान निवेशक शुरुआती खरीद और बिक्री के ऑर्डर दे सकते हैं, जिसके आधार पर एक्सचेंज शेयरों के शुरुआती मूल्य (ओपनिंग प्राइस) तय करते हैं। इसके बाद मुख्य सत्र में निवेशक अपने वास्तविक सौदे निष्पादित करते हैं।
क्यों शुभ मानी जाती है मुहूर्त ट्रेडिंग?
मुहूर्त ट्रेडिंग केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि यह शुभ अवसरों पर नए कार्यों की शुरुआत और निवेश करने की पुरानी भारतीय परंपरा को दर्शाती है।
मान्यता है कि दिवाली के मुहूर्त पर शेयर खरीदने से आने वाले साल में समृद्धि, सौभाग्य और वित्तीय वृद्धि आती है। जहां कुछ व्यापारी परंपरा के तौर पर छोटे निवेश करते हैं, वहीं कई निवेशक इस सत्र में सक्रिय रूप से भाग लेकर वास्तविक व्यापारिक सौदे भी करते हैं।
'डीआरचोकसे फिनसर्व' के प्रबंध निदेशक देवेन चोकसी के अनुसार, यह परंपरा किसी भी शुभ मुहूर्त में नई वस्तु खरीदने की सदियों पुरानी प्रथा से जुड़ी है। दिवाली और धनतेरस पर लोग समृद्धि के प्रतीक के रूप में नए बही-खाते, बर्तन या कीमती धातुएं खरीदते हैं। शेयर बाजार के प्रतिभागियों ने इसी सोच को निवेश से जोड़ दिया और नए व्यावसायिक वर्ष का स्वागत करने के लिए इस शुभ समय में शेयर खरीदना शुरू कर दिया।
कैसे हुई इस परंपरा की शुरुआत?
दिवाली और शेयर बाजार का संबंध दशकों पुराना है। पुराने समय में ब्रोकरेज दफ्तरों में दिवाली की तैयारियां काफी महत्व रखती थीं, जहां नया कारोबारी साल शुरू करने से पहले पारंपरिक पूजा-अर्चना की जाती थी।
'द इकोनॉमिक टाइम्स' की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रोकर धनतेरस पर अपने दफ्तरों की सफाई करते थे, 'चौपड़ी' नाम से नए बही-खाते खरीदते थे और नए साल से पहले अपनी खाता-पुस्तकों को व्यवस्थित करते थे। इसके बाद लक्ष्मी पूजा और चोपड़ा पूजन किया जाता था, जिसमें आने वाले साल में समृद्धि और सफल कारोबार की कामना के साथ बही-खातों की पूजा होती थी।
'दलाल एंड ब्रोचा सिक्योरिटीज' के दिग्गज ब्रोकर प्रियकांत दलाल के अनुभवों का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि वे 1955 से ऐसे आयोजनों में भाग ले रहे थे। उस समय बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के आसपास कई ब्रोकरेज दफ्तर हुआ करते थे। पूजा के बाद ब्रोकर एक-दूसरे को दिवाली की बधाई देने जाते थे और दिवाली के दिन वे बीएसई के बड़े ट्रेडिंग हॉल में विशेष मुहूर्त ट्रेडिंग सत्र के लिए एकत्र होते थे।
1957 से हुई औपचारिक शुरुआत
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के अनुसार, दिवाली पर औपचारिक रूप से मुहूर्त ट्रेडिंग आयोजित करने की परंपरा 1957 से शुरू हुई थी। एक्सचेंज ने अपनी 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के पृष्ठ 22 पर भी इस इतिहास का उल्लेख किया है।
इन्वेस्टर और ट्रेडर हर्ष वोरा ने भी अपने एक लेख में बीएसई में मुहूर्त ट्रेडिंग की शुरुआत को 1957 से जोड़ा है। उनके अनुसार, यह विशेष सत्र नए व्यावसायिक वर्ष (संवत) की शुरुआत से जुड़ा है। कई निवेशक आने वाले साल का स्वागत करने के लिए प्रतीकात्मक रूप से इस दौरान कुछ शेयर खरीदते हैं। हालांकि, 1957 से शुरुआत की पुष्टि के बावजूद रिकॉर्ड में यह उल्लेख नहीं मिलता कि पहला सत्र किसने शुरू किया था या पहला सौदा किस कंपनी के शेयर का हुआ था।
क्या केवल रस्म है या वास्तविक ट्रेडिंग भी होती है?
भले ही मुहूर्त ट्रेडिंग का गहरा सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है, लेकिन यह केवल एक औपचारिक रस्म नहीं है। इस विशेष सत्र के दौरान शेयरों की वास्तविक खरीद-बिक्री होती है।
कुछ लोग जहां सांकेतिक निवेश करते हैं, वहीं अन्य अपनी बाजार रणनीतियों के आधार पर बड़े सौदे भी करते हैं। हालांकि, शुभ समय में किया गया निवेश लाभ की गारंटी नहीं देता और इसमें बाजार के जोखिम हमेशा शामिल रहते हैं। डिजिटल युग में भी दिवाली का यह वार्षिक सत्र निवेशकों को अपनी नई वित्तीय शुरुआत के लिए आकर्षित करता है।
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