दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक विशेष ड्रोन निगरानी; पांच साल के रोडमैप में पराली प्रबंधन, फसल विविधीकरण, बायोमास उद्योग और सख्त कार्रवाई पर जोर
दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक विशेष ड्रोन निगरानी; पांच साल के रोडमैप में पराली प्रबंधन, फसल विविधीकरण, बायोमास उद्योग और सख्त कार्रवाई पर जोर
खबर खास | चंडीगढ़
पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए राज्य सरकार पहली बार खेतों की ड्रोन से निगरानी करेगी। खास तौर पर दोपहर से रात के समय निगरानी बढ़ाई जाएगी, क्योंकि इस दौरान कुछ किसान कथित तौर पर उपग्रह निगरानी से बचने की कोशिश करते हैं। पराली जलाने की घटनाओं की पहचान के लिए दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक विशेष निगरानी की जाएगी। सरकार ने इस समय को खेतों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं की पहचान के लिहाज से महत्वपूर्ण माना है।
यह कदम मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार के 2030 तक पराली जलाने की घटनाओं को शून्य करने के लक्ष्य के तहत तैयार किए गए पांच साल के रोडमैप का हिस्सा है। सरकार का जोर केवल किसानों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने पर नहीं है, बल्कि धान की पराली को आर्थिक संसाधन में बदलने पर भी है। इसके लिए खेत में ही पराली प्रबंधन और खेत से बाहर पराली के उपयोग की रणनीति अपनाई जा रही है।
आधिकारिक अनुमान के अनुसार, पंजाब में इस सीजन करीब 31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होने की संभावना है। इससे लगभग 1.881 करोड़ मीट्रिक टन धान की पराली पैदा होने का अनुमान है। इतनी बड़ी मात्रा में पराली के प्रबंधन के लिए सरकार ने फसल विविधीकरण, आधुनिक कृषि मशीनरी, बायोमास आधारित उद्योगों, बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्रों को रणनीति में शामिल किया है।
खेत में ही पराली के प्रबंधन के तहत करीब 1.015 करोड़ मीट्रिक टन पराली को 1,58,898 सब्सिडी वाली कृषि मशीनों की मदद से खेतों में मिलाने की योजना है। वहीं, खेत से बाहर पराली के उपयोग के तहत करीब 70.8 लाख मीट्रिक टन पराली को बायोमास और बायोगैस संयंत्रों में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा करीब 8.6 लाख मीट्रिक टन पराली का इस्तेमाल पशु चारे के रूप में करने का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार की दीर्घकालिक रणनीति में फसल विविधीकरण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। आने वाले वर्षों में राज्य में धान की खेती का क्षेत्र करीब 7 लाख हेक्टेयर कम करने का लक्ष्य है। इससे धान की कटाई के बाद पैदा होने वाली पराली की मात्रा को शुरुआत में ही कम किया जा सकेगा।
राज्य में पराली जलाने की घटनाओं में पिछले कुछ वर्षों में कमी दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में 76,929 मामले दर्ज हुए थे, जो घटकर 2024 में 10,909 रह गए। वर्ष 2025 में इनकी संख्या और घटकर 5,114 रह गई। यह 2024 की तुलना में करीब 54 प्रतिशत की कमी है।
हालांकि, पराली जलाने की समस्या कुछ जिलों में अब भी ज्यादा केंद्रित है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक संगरूर, फिरोजपुर, बठिंडा, मोगा, मुक्तसर, मानसा, तरनतारन और फरीदकोट में कुल मामलों के करीब 67 प्रतिशत मामले सामने आए। इन जिलों में अकेले 3,454 घटनाएं दर्ज की गईं।
संवेदनशील इलाकों में निगरानी और कार्रवाई मजबूत करने के लिए सरकार ने 12 हजार से अधिक अधिकारियों को तैनात किया है। तकनीकी निगरानी के साथ प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई भी तेज की गई है।
पिछले वर्ष पराली जलाने से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने वाले किसानों के खिलाफ 1,963 एफआईआर दर्ज की गईं, जबकि 2,176 किसानों के भूमि रिकॉर्ड में रेड एंट्री की गई। पर्यावरणीय मुआवजे की राशि भी बढ़ाई गई है, जिससे नियमों का उल्लंघन करने पर किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ा है।
पंजाब सरकार के नए रोडमैप की खास बात यह है कि इसमें धान की पराली को केवल कृषि कचरा मानने के बजाय उसके पूरे उपयोग की व्यवस्था तैयार करने पर जोर दिया गया है। सरकार की योजना में खेतों में पराली प्रबंधन से लेकर बायोमास, बायोगैस, सीबीजी और पशु चारे के रूप में इसके इस्तेमाल तक पूरी श्रृंखला विकसित करना शामिल है। अब इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि गांव स्तर पर निगरानी, मशीनरी की उपलब्धता, पराली के संग्रह और उसके व्यावसायिक उपयोग की व्यवस्था कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती है।
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