पौड़ी से पायलट प्रोजेक्ट की तैयारी, असम और हिमाचल में तैयार हो चुके हैं करीब 150 ड्रोन रूट; बारिश, भूस्खलन और बर्फबारी में भी दूरदराज गांवों तक पहुंच सकेगी जरूरी डाक
पौड़ी से पायलट प्रोजेक्ट की तैयारी, असम और हिमाचल में तैयार हो चुके हैं करीब 150 ड्रोन रूट; बारिश, भूस्खलन और बर्फबारी में भी दूरदराज गांवों तक पहुंच सकेगी जरूरी डाक
ख़बर ख़ास | उत्तराखंड
उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में अब डाक पहुंचाने का तरीका बदलने जा रहा है। जिन गांवों तक पहुंचने के लिए डाक कर्मचारियों को घंटों पैदल या सड़क मार्ग से लंबा सफर तय करना पड़ता है, वहां जल्द ही ड्रोन के जरिए डाक और पार्सल पहुंचाए जा सकते हैं। डाक विभाग ने इसके लिए उत्तराखंड में संभावित ड्रोन रूट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत पौड़ी जिले से किए जाने की संभावना है।
इस परियोजना के तहत सबसे पहले ऐसे दुर्गम क्षेत्रों को चुना जाएगा, जहां सड़क मार्ग से डाक पहुंचाने में काफी समय लगता है या मौसम खराब होने पर संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। यदि शुरुआती ट्रायल सफल रहता है, तो इसे उत्तराखंड के दूसरे पहाड़ी जिलों तक भी विस्तार दिया जा सकता है। इससे दूरस्थ गांवों में डाक पहुंचाने का समय कम होने के साथ कर्मचारियों की मेहनत भी बचेगी।
ड्रोन डिलीवरी की जरूरत उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में और ज्यादा महसूस होती है। मानसून के दौरान भूस्खलन और सड़कें बंद होने तथा सर्दियों में बर्फबारी के कारण कई इलाकों का संपर्क टूट जाता है। ऐसी परिस्थितियों में ड्रोन के जरिए जरूरी दस्तावेज, डाक और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने की संभावना है। भविष्य में आपदा के समय भी यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।
डाक विभाग ने ड्रोन डिलीवरी का प्रयोग पहले असम और हिमाचल प्रदेश में किया है। दोनों राज्यों में करीब 150 ड्रोन रूट तैयार किए जा चुके हैं। हिमाचल प्रदेश के मंडी में ड्रोन के जरिए तिरंगा पहुंचाने का ट्रायल भी किया गया था। करीब 12 किलोमीटर की दूरी ड्रोन ने महज 6 से 7 मिनट में पूरी की, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में इस तकनीक की क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
उत्तराखंड में ड्रोन रूट तैयार करते समय पहाड़ों की ऊंचाई, मौसम, हवा की गति और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाएगा। हर क्षेत्र के लिए अलग हवाई मार्ग तय किए जाने की योजना है, ताकि सुरक्षित और तेज डिलीवरी सुनिश्चित की जा सके।
ड्रोन के इस्तेमाल से सड़क मार्ग की कई बाधाओं को पार किया जा सकेगा। खासकर मानसून और बर्फबारी के दौरान जब सड़कें बंद होती हैं, तब भी जरूरी डाक पहुंचाने का विकल्प उपलब्ध रहेगा। हालांकि अभी यह योजना शुरुआती चरण में है और प्रति डाक या पार्सल डिलीवरी की लागत तय नहीं हुई है।
ड्रोन की खरीद और रखरखाव, तकनीकी सिस्टम, ऑपरेटर और संचालन से जुड़े खर्चों को ध्यान में रखते हुए वास्तविक लागत का आकलन ट्रायल और रूट तय होने के बाद किया जाएगा। फिलहाल डाक विभाग का फोकस पहाड़ों में इस नई तकनीक को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से लागू करने पर है। अगर प्रयोग सफल रहा, तो उत्तराखंड के दुर्गम गांवों तक डाक पहुंचाने में ड्रोन एक बड़ी तकनीकी क्रांति साबित हो सकता है।
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